श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः।

परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते॥ १७

nirguṇe brahmaṇi mayi dhārayan viśadaṃ manaḥ|

paramānandamāpnoti yatra kāmo'vasīyate|| 17

अर्थ

निर्गुण ब्रह्म भी मैं ही हूँ। जो अपना निर्मल मन मेरे इस ब्रह्मस्वरूपमें स्थित कर लेता है, उसे परमानन्द-स्वरूपिणी ‘कामावसायिता’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है। इसके मिलनेपर उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं॥ १७॥

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