॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.15.17
निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः।
परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते॥ १७
nirguṇe brahmaṇi mayi dhārayan viśadaṃ manaḥ|
paramānandamāpnoti yatra kāmo'vasīyate|| 17
अर्थ
निर्गुण ब्रह्म भी मैं ही हूँ। जो अपना निर्मल मन मेरे इस ब्रह्मस्वरूपमें स्थित कर लेता है, उसे परमानन्द-स्वरूपिणी ‘कामावसायिता’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है। इसके मिलनेपर उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं॥ १७॥