श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

श्‍वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि।

धारयञ्छ्वेततां याति षडूर्मिरहितो नरः॥ १८

śvetadvīpapatau cittaṃ śuddhe dharmamaye mayi|

dhārayañchvetatāṃ yāti ṣaḍūrmirahito naraḥ|| 18

अर्थ

प्रिय उद्धव! मेरा वह रूप, जो श्‍वेतद्वीपका स्वामी है, अत्यन्त शुद्ध और धर्ममय है। जो उसकी धारणा करता है, वह भूख-प्यास, जन्म-मृत्यु और शोक-मोह—इन छः ऊर्मियोंसे मुक्त हो जाता है और उसे शुद्ध स्वरूपकी प्राप्ति होती है॥ १८॥

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