श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन्।

तत्रोपलब्धा भूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ॥ १९

mayyākāśātmani prāṇe manasā ghoṣamudvahan|

tatropalabdhā bhūtānāṃ haṃso vācaḥ śṛṇotyasau|| 19

अर्थ

मैं ही समष्टि-प्राणरूप आकाशात्मा हूँ। जो मेरे इस स्वरूपमें मनके द्वारा अनाहत नादका चिन्तन करता है, वह ‘दूरश्रवण’ नामकी सिद्धिसे सम्पन्‍न हो जाता है और आकाशमें उपलब्ध होनेवाली विविध प्राणियोंकी बोली सुन-समझ सकता है॥ १९॥

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