श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

चक्षुस्त्वष्टरि संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि।

मां तत्र मनसा ध्यायन् विश्‍वं पश्यति सूक्ष्मदृक्॥ २०

cakṣustvaṣṭari saṃyojya tvaṣṭāramapi cakṣuṣi|

māṃ tatra manasā dhyāyan viśvaṃ paśyati sūkṣmadṛk|| 20

अर्थ

जो योगी नेत्रोंको सूर्यमें और सूर्यको नेत्रोंमें संयुक्त कर देता है और दोनोंके संयोगमें मन-ही-मन मेरा ध्यान करता है, उसकी दृष्टि सूक्ष्म हो जाती है, उसे ‘दूरदर्शन’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है और वह सारे संसारको देख सकता है॥ २०॥

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