॥ श्रीहरिः ॥
रत्नानां पद्मरागोऽस्मि पद्मकोशः सुपेशसाम्।
कुशोऽस्मि दर्भजातीनां गव्यमाज्यं हविःष्वहम्॥ ३०
ratnānāṃ padmarāgo'smi padmakośaḥ supeśasām|
kuśo'smi darbhajātīnāṃ gavyamājyaṃ haviḥṣvaham|| 30
अर्थ
रत्नोंमें पद्मराग (लाल), सुन्दर वस्तुओंमें कमलकी कली, तृणोंमें कुश और हविष्योंमें गायका घी हूँ॥ ३०॥✎ 1750
रत्नानां पद्मरागोऽस्मि पद्मकोशः सुपेशसाम्।
कुशोऽस्मि दर्भजातीनां गव्यमाज्यं हविःष्वहम्॥ ३०
रत्नोंमें पद्मराग (लाल), सुन्दर वस्तुओंमें कमलकी कली, तृणोंमें कुश और हविष्योंमें गायका घी हूँ॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 812) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/16/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1750 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-पुरुषोंमें) → महापुरुषोंमें)