श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

व्यवसायिनामहं लक्ष्मीः कितवानां छलग्रहः।

तितिक्षास्मि तितिक्षूणां सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ ३१

vyavasāyināmahaṃ lakṣmīḥ kitavānāṃ chalagrahaḥ|

titikṣāsmi titikṣūṇāṃ sattvaṃ sattvavatāmaham|| 31

अर्थ

मैं व्यापारियोंमें रहनेवाली लक्ष्मी, छल-कपट करनेवालोंमें द्यूतक्रीडा, तितिक्षुओंकी तितिक्षा (कष्टसहिष्णुता) और सात्त्विक पुरुषोंमें रहनेवाला सत्त्वगुण हूँ॥ ३१॥✎ 1750

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1750 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-पुरुषोंमें) → महापुरुषोंमें)

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