॥ श्रीहरिः ॥
अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसुः।
प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोऽहं नभसः परः॥ ३४
apāṃ rasaśca paramastejiṣṭhānāṃ vibhāvasuḥ|
prabhā sūryendutārāṇāṃ śabdo'haṃ nabhasaḥ paraḥ|| 34
अर्थ
मैं जलमें रस, तेजस्वियोंमें परम तेजस्वी अग्नि; सूर्य, चन्द्र और तारोंमें प्रभा तथा आकाशमें उसका एकमात्र गुण शब्द हूँ॥ ३४॥
अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसुः।
प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोऽहं नभसः परः॥ ३४
मैं जलमें रस, तेजस्वियोंमें परम तेजस्वी अग्नि; सूर्य, चन्द्र और तारोंमें प्रभा तथा आकाशमें उसका एकमात्र गुण शब्द हूँ॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 812) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/16/34/