॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.16.40
तेजः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्यागः सौभगं भगः।✎ 1221
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र स मेंऽशकः॥ ४०
tejaḥ śrīḥ kīrtiraiśvaryaṃ hrīstyāgaḥ saubhagaṃ bhagaḥ|
vīryaṃ titikṣā vijñānaṃ yatra yatra sa meṃ'śakaḥ|| 40
अर्थ
ऐसा समझो कि जिसमें भी तेज, श्री, कीर्ति, ऐश्वर्य, लज्जा, त्याग, सौन्दर्य, सौभाग्य, पराक्रम, तितिक्षा और विज्ञान आदि श्रेष्ठ गुण हों, वह मेरा ही अंश है॥ ४०॥