श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तेजः श्रीः कीर्तिरैश्‍वर्यं ह्रीस्त्यागः सौभगं भगः।✎ 1221

वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र स मेंऽशकः॥ ४०

tejaḥ śrīḥ kīrtiraiśvaryaṃ hrīstyāgaḥ saubhagaṃ bhagaḥ|

vīryaṃ titikṣā vijñānaṃ yatra yatra sa meṃ'śakaḥ|| 40

अर्थ

ऐसा समझो कि जिसमें भी तेज, श्री, कीर्ति, ऐश्‍वर्य, लज्जा, त्याग, सौन्दर्य, सौभाग्य, पराक्रम, तितिक्षा और विज्ञान आदि श्रेष्ठ गुण हों, वह मेरा ही अंश है॥ ४०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1221 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस्त्याग: → ह्रीस्त्यागः

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