श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

आचार्यं मां विजानीयान्‍नावमन्येत कर्हिचित्।

न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥ २७

ācāryaṃ māṃ vijānīyānnāvamanyeta karhicit|

na martyabuddhyāsūyeta sarvadevamayo guruḥ|| 27

अर्थ

आचार्यको मेरा ही स्वरूप समझे, कभी उनका तिरस्कार न करे। उन्हें साधारण मनुष्य समझकर दोषदृष्टि न करे; क्योंकि गुरु सर्वदेवमय होता है॥ २७॥

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