श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.42

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।

कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च॥ ४२

brāhmaṇasya hi deho'yaṃ kṣudrakāmāya neṣyate|

kṛcchrāya tapase ceha pretyānantasukhāya ca|| 42

अर्थ

उद्धव! ब्राह्मणका शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। यह इसलिये नहीं है कि इसके द्वारा तुच्छ विषय-भोग ही भोगे जायँ। यह तो जीवन-पर्यन्त कष्ट भोगने, तपस्या करने और अन्तमें अनन्त आनन्दस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति करनेके लिये है॥ ४२॥✎ 1751 1752

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1751 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली
  • #1752 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समान-रूपसे → समानरूपसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें