श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः।

मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठन्‍नातिप्रसक्तः समुपैति शान्तिम्॥ ४३✎ 1542

śiloñchavṛttyā parituṣṭacitto dharmaṃ mahāntaṃ virajaṃ juṣāṇaḥ|

mayyarpitātmā gṛha eva tiṣṭhannātiprasaktaḥ samupaiti śāntim|| 43

अर्थ

जो ब्राह्मण घरमें रहकर अपने महान् धर्मका निष्कामभावसे पालन करता है और खेतोंमें तथा बाजारोंमें गिरे-पड़े दाने चुनकर सन्तोषपूर्वक अपने जीवनका निर्वाह करता है, साथ ही अपना शरीर, प्राण, अन्तःकरण और आत्मा मुझे समर्पित कर देता है और कहीं भी अत्यन्त आसक्ति नहीं करता, वह बिना संन्यास लिये ही परमशान्तिस्वरूप परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ४३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1542 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तिष्ठ- न्‍नातिप्रसक्त: → तिष्ठन्‍नातिप्रसक्तः

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