श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि।

सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः॥ ५

vaktā kartāvitā nānyo dharmasyācyuta te bhuvi|

sabhāyāmapi vairiñcyāṃ yatra mūrtidharāḥ kalāḥ|| 5

अर्थ

अच्युत! पृथ्वीमें तथा ब्रह्माकी उस सभामें भी, जहाँ सम्पूर्ण वेद मूर्तिमान् होकर विराजमान रहते हैं, आपके अतिरिक्त ऐसा कोई भी नहीं है, जो आपके इस धर्मका प्रवचन, प्रवर्त्तन अथवा संरक्षण कर सके॥ ५॥

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