na hyete yasya santyaṃga veṇubhirna bhaved yatiḥ|| 17
अर्थ
वाणीके लिये मौन, शरीरके लिये निश्चेष्ट स्थिति और मनके लिये प्राणायाम दण्ड हैं। जिसके पास ये तीनों दण्ड नहीं हैं, वह केवल शरीरपर बाँसके दण्ड धारण करनेसे दण्डी स्वामी नहीं हो जाता॥ १७॥
मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम्।
न ह्येते यस्य सन्त्यंग वेणुभिर्न भवेद् यतिः॥ १७
वाणीके लिये मौन, शरीरके लिये निश्चेष्ट स्थिति और मनके लिये प्राणायाम दण्ड हैं। जिसके पास ये तीनों दण्ड नहीं हैं, वह केवल शरीरपर बाँसके दण्ड धारण करनेसे दण्डी स्वामी नहीं हो जाता॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.18.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 823) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/18/17/