श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

नैतद् वस्तुतया पश्येद् दृश्यमानं विनश्यति।

असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात्॥ २६

naitad vastutayā paśyed dṛśyamānaṃ vinaśyati|

asaktacitto viramedihāmutra cikīrṣitāt|| 26

अर्थ

विचारवान् संन्यासी दृश्यमान जगत‍्को सत्य वस्तु कभी न समझे; क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही नाशवान् है। इस जगत‍्में कहीं भी अपने चित्तको लगाये नहीं। इस लोक और परलोकमें जो कुछ करने-पानेकी इच्छा हो, उससे विरक्त हो जाय॥ २६॥

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