श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम्।

सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत्॥ २७

yadetadātmani jaganmanovākprāṇasaṃhatam|

sarvaṃ māyeti tarkeṇa svasthastyaktvā na tat smaret|| 27

अर्थ

संन्यासी विचार करे कि आत्मामें जो मन, वाणी और प्राणोंका संघातरूप यह जगत् है, वह सारा-का-सारा माया ही है। इस विचारके द्वारा इसका बाध करके अपने स्वरूपमें स्थित हो जाय और फिर कभी उसका स्मरण भी न करे॥ २७॥

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