॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.18.27
यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम्।
सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत्॥ २७
yadetadātmani jaganmanovākprāṇasaṃhatam|
sarvaṃ māyeti tarkeṇa svasthastyaktvā na tat smaret|| 27
अर्थ
संन्यासी विचार करे कि आत्मामें जो मन, वाणी और प्राणोंका संघातरूप यह जगत् है, वह सारा-का-सारा माया ही है। इस विचारके द्वारा इसका बाध करके अपने स्वरूपमें स्थित हो जाय और फिर कभी उसका स्मरण भी न करे॥ २७॥