श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः।

सलिंगानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥ २८

jñānaniṣṭho virakto vā madbhakto vānapekṣakaḥ|

saliṃgānāśramāṃstyaktvā caredavidhigocaraḥ|| 28

अर्थ

ज्ञाननिष्ठ, विरक्त, मुमुक्षु और मोक्षकी भी अपेक्षा न रखनेवाला मेरा भक्त आश्रमोंकी मर्यादामें बद्ध नहीं है। वह चाहे तो आश्रमों और उनके चिह्नोंको छोड़-छाड़कर, वेद-शास्त्रके विधि-निषेधोंसे परे होकर स्वच्छन्द विचरे॥ २८॥

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