जो पुरुष इस प्रकार अनन्यभावसे अपने वर्णाश्रमधर्मके द्वारा मेरी सेवामें लगा रहता है और समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करता रहता है, उसे मेरी अविचल भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ४४॥
इति मां यः स्वधर्मेण भजन् नित्यमनन्यभाक्।
सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥ ४४
जो पुरुष इस प्रकार अनन्यभावसे अपने वर्णाश्रमधर्मके द्वारा मेरी सेवामें लगा रहता है और समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करता रहता है, उसे मेरी अविचल भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.18.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 827) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/44/