श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इति मां यः स्वधर्मेण भजन् नित्यमनन्यभाक्।

सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥ ४४

iti māṃ yaḥ svadharmeṇa bhajan nityamananyabhāk|

sarvabhūteṣu madbhāvo madbhaktiṃ vindate dṛḍhām|| 44

अर्थ

जो पुरुष इस प्रकार अनन्यभावसे अपने वर्णाश्रमधर्मके द्वारा मेरी सेवामें लगा रहता है और समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करता रहता है, उसे मेरी अविचल भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ४४॥

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