श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ब्रह्मचर्यं तपः शौचं सन्तोषो भूतसौहृदम्।

गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तुः सर्वेषां मदुपासनम्॥ ४३

brahmacaryaṃ tapaḥ śaucaṃ santoṣo bhūtasauhṛdam|

gṛhasthasyāpyṛtau gantuḥ sarveṣāṃ madupāsanam|| 43

अर्थ

गृहस्थ भी केवल ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रीका सहवास करे। उसके लिये भी ब्रह्मचर्य, तपस्या, शौच, सन्तोष और समस्त प्राणियोंके प्रति प्रेमभाव—ये मुख्य धर्म हैं। मेरी उपासना तो सभीको करनी चाहिये॥ ४३॥

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