श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसन्ततः।

मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैति माम्॥ ९

evaṃ cīrṇena tapasā munirdhamanisantataḥ|

māṃ tapomayamārādhya ṛṣilokādupaiti mām|| 9

अर्थ

इस प्रकार घोर तपस्या करते-करते मांस सूख जानेके कारण वानप्रस्थीकी एक-एक नस दीखने लगती है। वह इस तपस्याके द्वारा मेरी आराधना करके पहले तो ऋषियोंके लोकमें जाता है और वहाँसे फिर मेरे पास आ जाता है; क्योंकि तप मेरा ही स्वरूप है॥ ९॥

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