श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्चादमंगलम्।

विपश्‍चिन्‍नश्‍वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ १८

karmaṇāṃ pariṇāmitvādāviriñcādamaṃgalam|

vipaścinnaśvaraṃ paśyedadṛṣṭamapi dṛṣṭavat|| 18

अर्थ

विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह स्वर्गादि फल देनेवाले यज्ञादि कर्मोंके परिणामी—नश्‍वर होनेके कारण ब्रह्मलोकपर्यन्त स्वर्गादि सुख—अदृष्टको भी इस प्रत्यक्ष विषय-सुखके समान ही अमंगल, दुःखदायी एवं नाशवान् समझे॥ १८॥✎ 1753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1753 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-तन्मात्रा—ये → पंचतन्मात्रा—ये

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