श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्टः स्वार्थो हेतुश्‍च संमतः।

स्वर्गश्‍चैवापवर्गश्‍च नान्योऽर्थो मदृते प्रियः॥ २

jñāninastvahameveṣṭaḥ svārtho hetuśca saṃmataḥ|

svargaścaivāpavargaśca nānyo'rtho madṛte priyaḥ|| 2

अर्थ

ज्ञानी पुरुषका अभीष्ट पदार्थ मैं ही हूँ, उसके साधन-साध्य, स्वर्ग और अपवर्ग भी मैं ही हूँ, मेरे अतिरिक्त और किसी भी पदार्थसे वह प्रेम नहीं करता॥ २॥

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