श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अथैकोनविंशोऽध्यायः

भक्ति, ज्ञान और यम-नियमादि साधनोंका वर्णन

श्रीभगवानुवाच

यो विद्याश्रुतसम्पन्‍न आत्मवान् नानुमानिकः।

मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि संन्यसेत्॥ १

yo vidyāśrutasampanna ātmavān nānumānikaḥ|

māyāmātramidaṃ jñātvā jñānaṃ ca mayi saṃnyaset|| 1

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! जिसने उपनिषदादि शास्त्रोंके श्रवण, मनन और निदिध्यासनके द्वारा आत्मसाक्षात्कार कर लिया है, जो श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ है, जिसका निश्‍चय केवल युक्तियों और अनुमानोंपर ही निर्भर नहीं करता, दूसरे शब्दोंमें—जो केवल परोक्षज्ञानी नहीं है, वह यह जानकर कि सम्पूर्ण द्वैतप्रपंच और इसकी निवृत्तिका साधन वृत्तिज्ञान मायामात्र है, उन्हें मुझमें लीन कर दे, वे दोनों ही मुझ आत्मामें अध्यस्त हैं, ऐसा जान ले॥ १॥

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