॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.19.44
दरिद्रो यस्त्वसन्तुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः।
गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसंगो विपर्ययः॥ ४४
daridro yastvasantuṣṭaḥ kṛpaṇo yo'jitendriyaḥ|
guṇeṣvasaktadhīrīśo guṇasaṃgo viparyayaḥ|| 44
अर्थ
जिसके चित्तमें असन्तोष है, अभावका बोध है, वही ‘दरिद्र’ है। जो जितेन्द्रिय नहीं है, वही ‘कृपण’ है। समर्थ, स्वतन्त्र और ‘ईश्वर’ वह है, जिसकी चित्तवृत्ति विषयोंमें आसक्त नहीं है। इसके विपरीत जो विषयोंमें आसक्त है, वही सर्वथा ‘असमर्थ’ है॥ ४४॥