श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एत उद्धव ते प्रश्‍नाः सर्वे साधु निरूपिताः।

किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयोः।

गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः॥ ४५

eta uddhava te praśnāḥ sarve sādhu nirūpitāḥ|

kiṃ varṇitena bahunā lakṣaṇaṃ guṇadoṣayoḥ|

guṇadoṣadṛśirdoṣo guṇastūbhayavarjitaḥ|| 45

अर्थ

प्यारे उद्धव! तुमने जितने प्रश्‍न पूछे थे, उनका उत्तर मैंने दे दिया; इनको समझ लेना मोक्ष-मार्गके लिये सहायक है। मैं तुम्हें गुण और दोषोंका लक्षण अलग-अलग कहाँतक बताऊँ? सबका सारांश इतनेमें ही समझ लो कि गुणों और दोषोंपर दृष्टि जाना ही सबसे बड़ा दोष है और गुण-दोषोंपर दृष्टि न जाकर अपने शान्त निःसंकल्प स्वरूपमें स्थित रहे—वही सबसे बड़ा गुण है॥ ४५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः

॥ १९॥

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