श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वाऽऽत्मानमात्मनि।

सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन्॥ ६

jñānavijñānayajñena māmiṣṭvā''tmānamātmani|

sarvayajñapatiṃ māṃ vai saṃsiddhiṃ munayo'gaman|| 6

अर्थ

बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंने ज्ञान-विज्ञानरूप यज्ञके द्वारा अपने अन्तःकरणमें मुझ सब यज्ञोंके अधिपति आत्माका यजन करके परम सिद्धि प्राप्त की है॥ ६॥

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