श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

त्वय्युद्धवाश्रयति यस्त्रिविधो विकारो

मायान्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत्।

जन्मादयोऽस्य यदमी तव तस्य किं स्यु-

राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये॥ ७

tvayyuddhavāśrayati yastrividho vikāro

māyāntarā''patati nādyapavargayoryat|

janmādayo'sya yadamī tava tasya kiṃ syu-

rādyantayoryadasato'sti tadeva madhye|| 7

अर्थ

उद्धव! आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—इन तीन विकारोंकी समष्टि ही शरीर है और वह सर्वथा तुम्हारे आश्रित है। यह पहले नहीं था और अन्तमें नहीं रहेगा; केवल बीचमें ही दीख रहा है। इसलिये इसे जादूके खेलके समान माया ही समझना चाहिये। इसके जो जन्मना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट होना—ये छः भावविकार हैं, इनसे तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं है। यही नहीं, ये विकार उसके भी नहीं हैं; क्योंकि वह स्वयं असत् है। असत् वस्तु तो पहले नहीं थी, बादमें भी नहीं रहेगी; इसलिये बीचमें भी उसका कोई अस्तित्व नहीं होता॥ ७॥

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