श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यानास्थाय नरो राजन् न प्रमाद्येत कर्हिचित्।

धावन् निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्‍न पतेदिह॥ ३५

yānāsthāya naro rājan na pramādyeta karhicit|

dhāvan nimīlya vā netre na skhalenna patediha|| 35

अर्थ

राजन्! इन भागवतधर्मोंका अवलम्बन करके मनुष्य कभी विघ्नोंसे पीड़ित नहीं होता और नेत्र बंद करके दौड़नेपर भी अर्थात् विधि-विधानमें त्रुटि हो जानेपर भी न तो मार्गसे स्खलित ही होता है और न तो पतित—फलसे वञ्चित ही होता है॥ ३५॥✎ 899

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #899 शब्दोंके बीचका स्थान: चरणोंकीनित्य-निरन्तर → चरणोंकी नित्य-निरन्तर

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