dhāvan nimīlya vā netre na skhalenna patediha|| 35
अर्थ
राजन्! इन भागवतधर्मोंका अवलम्बन करके मनुष्य कभी विघ्नोंसे पीड़ित नहीं होता और नेत्र बंद करके दौड़नेपर भी अर्थात् विधि-विधानमें त्रुटि हो जानेपर भी न तो मार्गसे स्खलित ही होता है और न तो पतित—फलसे वञ्चित ही होता है॥ ३५॥✎ 899
यानास्थाय नरो राजन् न प्रमाद्येत कर्हिचित्।
धावन् निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह॥ ३५
राजन्! इन भागवतधर्मोंका अवलम्बन करके मनुष्य कभी विघ्नोंसे पीड़ित नहीं होता और नेत्र बंद करके दौड़नेपर भी अर्थात् विधि-विधानमें त्रुटि हो जानेपर भी न तो मार्गसे स्खलित ही होता है और न तो पतित—फलसे वञ्चित ही होता है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 717) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/2/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)