श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.48

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति।

विष्णोर्मायामिदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः॥ ४८

gṛhītvāpīndriyairarthān yo na dveṣṭi na hṛṣyati|

viṣṇormāyāmidaṃ paśyan sa vai bhāgavatottamaḥ|| 48

अर्थ

जो श्रोत्र-नेत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा शब्द-रूप आदि विषयोंका ग्रहण तो करता है; परन्तु अपनी इच्छाके प्रतिकूल विषयोंसे द्वेष नहीं करता और अनुकूल विषयोंके मिलनेपर हर्षित नहीं होता—उसकी यह दृष्टि बनी रहती है कि यह सब हमारे भगवान्‌की माया है—वह पुरुष उत्तम भागवत है॥ ४८॥

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