॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.2.49
देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।
संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः॥ ४९
dehendriyaprāṇamanodhiyāṃ yo janmāpyayakṣudbhayatarṣakṛcchraiḥ |
saṃsāradharmairavimuhyamānaḥ smṛtyā harerbhāgavatapradhānaḥ|| 49
अर्थ
संसारके धर्म हैं—जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट, भय और तृष्णा। ये क्रमशः शरीर, प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिको प्राप्त होते ही रहते हैं। जो पुरुष भगवान्की स्मृतिमें इतना तन्मय रहता है कि इनके बार-बार होते-जाते रहनेपर भी उनसे मोहित नहीं होता, पराभूत नहीं होता, वह उत्तम भागवत है॥ ४९॥