सुव्रत! अब आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे मैं इस जन्म-मृत्युरूप भयावह संसारसे—जिसमें दुःख भी सुखका विचित्र और मोहक रूप धारण करके सामने आते हैं—अनायास ही पार हो जाऊँ॥ ९॥
यथा विचित्रव्यसनाद् भवद्भिर्विश्वतोभयात्।
मुच्येम ह्यंजसैवाद्धा तथा नः शाधि सुव्रत॥ ९
सुव्रत! अब आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे मैं इस जन्म-मृत्युरूप भयावह संसारसे—जिसमें दुःख भी सुखका विचित्र और मोहक रूप धारण करके सामने आते हैं—अनायास ही पार हो जाऊँ॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 714) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/2/9/