पहले जन्ममें मैंने मुक्ति देनेवाले भगवान्की आराधना तो की थी, परन्तु इसलिये नहीं कि मुझे मुक्ति मिले। मेरी आराधनाका उद्देश्य था कि वे मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हों। उस समय मैं भगवान्की लीलासे मुग्ध हो रहा था॥ ८॥
अहं किल पुरानन्तं प्रजार्थो भुवि मुक्तिदम्।
अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया॥ ८
पहले जन्ममें मैंने मुक्ति देनेवाले भगवान्की आराधना तो की थी, परन्तु इसलिये नहीं कि मुझे मुक्ति मिले। मेरी आराधनाका उद्देश्य था कि वे मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हों। उस समय मैं भगवान्की लीलासे मुग्ध हो रहा था॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 714) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/2/8/