श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमनल्पकम्।

तस्मान्‍निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत्॥ ३५

nairapekṣyaṃ paraṃ prāhurniḥśreyasamanalpakam|

tasmānnirāśiṣo bhaktirnirapekṣasya me bhavet|| 35

अर्थ

उद्धवजी! सबसे श्रेष्ठ एवं महान् निःश्रेयस (परम कल्याण) तो निरपेक्षताका ही दूसरा नाम है। इसलिये जो निष्काम और निरपेक्ष होता है, उसीको मेरी भक्ति प्राप्त होती है॥ ३५॥✎ 1755

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1755 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कल्याण-स्वरूप → कल्याणस्वरूप

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