मेरे अनन्यप्रेमी भक्तोंका और उन समदर्शी महात्माओंका; जो बुद्धिसे अतीत परमतत्त्वको प्राप्त हो चुके हैं, इन विधि और निषेधसे होनेवाले पुण्य और पापसे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता॥ ३६॥✎ 1755
न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः।
साधूनां समचित्तानां बुद्धेः परमुपेयुषाम्॥ ३६
मेरे अनन्यप्रेमी भक्तोंका और उन समदर्शी महात्माओंका; जो बुद्धिसे अतीत परमतत्त्वको प्राप्त हो चुके हैं, इन विधि और निषेधसे होनेवाले पुण्य और पापसे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 838) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/20/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)