श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः।

साधूनां समचित्तानां बुद्धेः परमुपेयुषाम्॥ ३६

na mayyekāntabhaktānāṃ guṇadoṣodbhavā guṇāḥ|

sādhūnāṃ samacittānāṃ buddheḥ paramupeyuṣām|| 36

अर्थ

मेरे अनन्यप्रेमी भक्तोंका और उन समदर्शी महात्माओंका; जो बुद्धिसे अतीत परमतत्त्वको प्राप्त हो चुके हैं, इन विधि और निषेधसे होनेवाले पुण्य और पापसे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता॥ ३६॥✎ 1755

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1755 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कल्याण-स्वरूप → कल्याणस्वरूप

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