॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.21.18
यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।
एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥ १८✎ 1227
yato yato nivarteta vimucyeta tatastataḥ|
eṣa dharmo nṛṇāṃ kṣemaḥ śokamohabhayāpahaḥ|| 18
अर्थ
जिन-जिन दोषों और गुणोंसे मनुष्यका चित्त उपरत हो जाता है, उन्हीं वस्तुओंके बन्धनसे वह मुक्त हो जाता है। मनुष्योंके लिये यह निवृत्तिरूप धर्म ही परम कल्याणका साधन है; क्योंकि यही शोक, मोह और भयको मिटानेवाला है॥ १८॥