श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।

तमसा ग्रस्यते पुंसश्‍चेतना व्यापिनी द्रुतम्॥ २०

kalerdurviṣahaḥ krodhastamastamanuvartate|

tamasā grasyate puṃsaścetanā vyāpinī drutam|| 20

अर्थ

कलहसे असह्य क्रोधकी उत्पत्ति होती है और क्रोधके समय अपने हित-अहितका बोध नहीं रहता, अज्ञान छा जाता है। इस अज्ञानसे शीघ्र ही मनुष्यकी कार्याकार्यका निर्णय करनेवाली व्यापक चेतनाशक्ति लुप्त हो जाती है॥ २०॥✎ 1758

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1758 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: चेतना-शक्ति → चेतनाशक्ति

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