श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।

द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ॥ ३

śuddhyaśuddhī vidhīyete samāneṣvapi vastuṣu|

dravyasya vicikitsārthaṃ guṇadoṣau śubhāśubhau|| 3

अर्थ

वस्तुओंके समान होनेपर भी शुद्धि-अशुद्धि, गुण-दोष और शुभ-अशुभ आदिका जो विधान किया जाता है, उसका अभिप्राय यह है कि पदार्थका ठीक-ठीक निरीक्षण-परीक्षण हो सके और उनमें सन्देह उत्पन्‍न करके ही यह योग्य है कि अयोग्य, स्वाभाविक प्रवृत्तिको नियन्त्रित—संकुचित किया जा सके॥ ३॥✎ 1756 1757

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1756 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-योग्य → करनेयोग्य
  • #1757 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-भूत → पंचभूत

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