श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।

दर्शितोऽयं मयाऽऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम्॥ ४

dharmārthaṃ vyavahārārthaṃ yātrārthamiti cānagha|

darśito'yaṃ mayā''cāro dharmamudvahatāṃ dhuram|| 4

अर्थ

उनके द्वारा धर्म-सम्पादन कर सके, समाजका व्यवहार ठीक-ठीक चला सके और अपने व्यक्तिगत जीवनके निर्वाहमें भी सुविधा हो। इससे यह लाभ भी है कि मनुष्य अपनी वासनामूलक सहज प्रवृत्तियोंके द्वारा इनके जालमें न फँसकर शास्त्रानुसार अपने जीवनको नियन्त्रित और मनको वशीभूत कर लेता है। निष्पाप उद्धव! यह आचार मैंने ही मनु आदिका रूप धारण करके धर्मका भार ढोनेवाले कर्म जडोंके लिये उपदेश किया है॥ ४॥✎ 1756 1757

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1756 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-योग्य → करनेयोग्य
  • #1757 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-भूत → पंचभूत

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