किन्तु कुछ लोग छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं तो कुछ पचीस; कोई सात, नौ अथवा छः स्वीकार करते हैं, कोई चार बतलाते हैं तो कोई ग्यारह॥ २॥
केचित् षड्विंशतिं प्राहुरपरे पंचविंशतिम्।
सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे॥ २
किन्तु कुछ लोग छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं तो कुछ पचीस; कोई सात, नौ अथवा छः स्वीकार करते हैं, कोई चार बतलाते हैं तो कोई ग्यारह॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 846) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/22/2/