श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

केचित् सप्तदश प्राहुः षोडशैके त्रयोदश।

एतावत्त्वं हि संख्यानामृषयो यद्विवक्षया।

गायन्ति पृथगायुष्मन्‍निदं नो वक्तुमर्हसि॥ ३

kecit saptadaśa prāhuḥ ṣoḍaśaike trayodaśa|

etāvattvaṃ hi saṃkhyānāmṛṣayo yadvivakṣayā|

gāyanti pṛthagāyuṣmannidaṃ no vaktumarhasi|| 3

अर्थ

इसी प्रकार किन्हीं-किन्हीं ऋषि-मुनियोंके मतमें उनकी संख्या सत्रह है, कोई सोलह और कोई तेरह बतलाते हैं। सनातन श्रीकृष्ण! ऋषि-मुनि इतनी भिन्‍न संख्याएँ किस अभिप्रायसे बतलाते हैं? आप कृपा करके हमें बतलाइये ॥ ३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें