श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्‍च तथाऽऽत्मनि।

एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।

छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणैः॥ २७

prakṛtau lakṣyate hyātmā prakṛtiśca tathā''tmani|

evaṃ me puṇḍarīkākṣa mahāntaṃ saṃśayaṃ hṛdi|

chettumarhasi sarvajña vacobhirnayanaipuṇaiḥ|| 27

अर्थ

कमलनयन श्रीकृष्ण! मेरे हृदयमें इनकी भिन्नता और अभिन्नताको लेकर बहुत बड़ा सन्देह है। आप तो सर्वज्ञ हैं, अपनी युक्तियुक्त वाणीसे मेरे सन्देहका निवारण कर दीजिये ॥ २७॥ भगवन्! आपकी ही कृपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी माया-शक्तिसे ही उनके ज्ञानका नाश होता है। अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं और कोई नहीं जानता। अतएव आप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं ॥ २८॥✎ 1449 1450

यह व्याख्या श्लोक 11.22.27 से 11.22.28 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1449 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): जीवोंका → जीवोंको
  • #1450 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भगवान्! → भगवन्!

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