श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तितः।

त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापरः॥ २८

tvatto jñānaṃ hi jīvānāṃ pramoṣaste'tra śaktitaḥ|

tvameva hyātmamāyāyā gatiṃ vettha na cāparaḥ|| 28

अर्थ

भगवन्! आपकी ही कृपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी माया-शक्तिसे ही उनके ज्ञानका नाश होता है। अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं और कोई नहीं जानता। अतएव आप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं ॥ २८॥✎ 1449 1450

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1449 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): जीवोंका → जीवोंको
  • #1450 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भगवान्! → भगवन्!

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