भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! प्रकृति और पुरुष, शरीर और आत्मा—इन दोनोंमें अत्यन्त भेद है। इस प्राकृत जगत्में जन्म-मरण एवं वृद्धि-ह्रास आदि विकार लगे ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि यह गुणोंके क्षोभसे ही बना है॥ २९॥✎ 1451
प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ।
एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः॥ २९
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! प्रकृति और पुरुष, शरीर और आत्मा—इन दोनोंमें अत्यन्त भेद है। इस प्राकृत जगत्में जन्म-मरण एवं वृद्धि-ह्रास आदि विकार लगे ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि यह गुणोंके क्षोभसे ही बना है॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 850) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1451 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृद्धि-ह्रस → वृद्धि-ह्रास