श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत्तथा।

एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्ययाः॥ ५

naitadevaṃ yathā''ttha tvaṃ yadahaṃ vacmi tattathā|

evaṃ vivadatāṃ hetuṃ śaktayo me duratyayāḥ|| 5

अर्थ

‘जैसा तुम कहते हो, वह ठीक नहीं है, जो मैं कहता हूँ, वही यथार्थ है’—इस प्रकार जगत‍्के कारणके सम्बन्धमें विवाद इसलिये होता है कि मेरी शक्तियों—सत्त्व, रज आदि गुणों और उनकी वृत्तियोंका रहस्य लोग समझ नहीं पाते; इसलिये वे अपनी-अपनी मनोवृत्तिपर ही आग्रह कर बैठते हैं॥ ५॥✎ 1762

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1762 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुष-शिरोमणे! → पुरुषशिरोमणे!

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