श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम्।

प्राप्ते शमदमेऽप्येति वादस्तमनुशाम्यति॥ ६

yāsāṃ vyatikarādāsīd vikalpo vadatāṃ padam|

prāpte śamadame'pyeti vādastamanuśāmyati|| 6

अर्थ

सत्त्व आदि गुणोंके क्षोभसे ही यह विविध कल्पनारूप प्रपंच—जो वस्तु नहीं केवल नाम है—उठ खड़ा हुआ है। यही वाद-विवाद करनेवालोंके विवादका विषय है। जब इन्द्रियाँ अपने वशमें हो जाती हैं तथा चित्त शान्त हो जाता है, तब यह प्रपंच भी निवृत्त हो जाता है और इसकी निवृत्तिके साथ ही सारे वाद-विवाद भी मिट जाते हैं॥ ६॥✎ 1762

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1762 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुष-शिरोमणे! → पुरुषशिरोमणे!

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