सत्त्व आदि गुणोंके क्षोभसे ही यह विविध कल्पनारूप प्रपंच—जो वस्तु नहीं केवल नाम है—उठ खड़ा हुआ है। यही वाद-विवाद करनेवालोंके विवादका विषय है। जब इन्द्रियाँ अपने वशमें हो जाती हैं तथा चित्त शान्त हो जाता है, तब यह प्रपंच भी निवृत्त हो जाता है और इसकी निवृत्तिके साथ ही सारे वाद-विवाद भी मिट जाते हैं॥ ६॥✎ 1762
यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम्।
प्राप्ते शमदमेऽप्येति वादस्तमनुशाम्यति॥ ६
सत्त्व आदि गुणोंके क्षोभसे ही यह विविध कल्पनारूप प्रपंच—जो वस्तु नहीं केवल नाम है—उठ खड़ा हुआ है। यही वाद-विवाद करनेवालोंके विवादका विषय है। जब इन्द्रियाँ अपने वशमें हो जाती हैं तथा चित्त शान्त हो जाता है, तब यह प्रपंच भी निवृत्त हो जाता है और इसकी निवृत्तिके साथ ही सारे वाद-विवाद भी मिट जाते हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 846) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/22/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)