श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.50

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्याबुधः पुमान्।

तत्त्वेन स्पर्शसम्मूढः संसारं प्रतिपद्यते॥ ५०

prakṛterevamātmānamavivicyābudhaḥ pumān|

tattvena sparśasammūḍhaḥ saṃsāraṃ pratipadyate|| 50

अर्थ

अज्ञानी पुरुष इस प्रकार प्रकृति और शरीरसे आत्माका विवेचन नहीं करते। वे उसे उनसे तत्त्वतः अलग अनुभव नहीं करते और विषयभोगमें सच्चा सुख मानने लगते हैं तथा उसीमें मोहित हो जाते हैं। इसीसे उन्हें जन्म-मृत्युरूप संसारमें भटकना पड़ता है॥ ५०॥

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