श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.60

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

विदुषामपि विश्‍वात्मन् प्रकृतिर्हि बलीयसी।

ऋते त्वद्धर्मनिरतान् शान्तांस्ते चरणालयान्॥ ६०

viduṣāmapi viśvātman prakṛtirhi balīyasī|

ṛte tvaddharmaniratān śāntāṃste caraṇālayān|| 60

अर्थ

विश्‍वात्मन्! जो आपके भागवतधर्मके आचरणमें प्रेम-पूर्वक संल‌ग्‍न हैं, जिन्होंने आपके चरणकमलोंका ही आश्रय ले लिया है, उन शान्त पुरुषोंके अतिरिक्त बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी दुष्टोंके द्वारा किया हुआ तिरस्कार सह लेना अत्यन्त कठिन है; क्योंकि प्रकृति अत्यन्त बलवती है॥ ६०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः

॥ २२॥

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