श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

एक तितिक्षु ब्राह्मणका इतिहास

बादरायणिरुवाच

स एवमाशंसित उद्धवेन

भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः।

सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्द-

स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः॥ १

sa evamāśaṃsita uddhavena

bhāgavatamukhyena dāśārhamukhyaḥ|

sabhājayan bhṛtyavaco mukunda-

stamābabhāṣe śravaṇīyavīryaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वास्तवमें भगवान्‌की लीलाकथा ही श्रवण करनेयोग्य है। वे ही प्रेम और मुक्तिके दाता हैं। जब उनके परमप्रेमी भक्त उद्धवजीने इस प्रकार प्रार्थना की, तब यदुवंशविभूषण श्रीभगवान्‌ने उनके प्रश्‍नकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

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