॥ श्रीहरिः ॥
न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैः सुमर्मगैः।
यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषवः॥ ३
na tathā tapyate viddhaḥ pumān bāṇaiḥ sumarmagaiḥ|
yathā tudanti marmasthā hyasatāṃ paruṣeṣavaḥ|| 3
अर्थ
मनुष्यका हृदय मर्मभेदी बाणोंसे बिंधनेपर भी उतनी पीडाका अनुभव नहीं करता, जितनी पीडा उसे दुष्टजनोंके मर्मान्तक एवं कठोर वाग्बाण पहुँचाते हैं॥ ३॥
न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैः सुमर्मगैः।
यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषवः॥ ३
मनुष्यका हृदय मर्मभेदी बाणोंसे बिंधनेपर भी उतनी पीडाका अनुभव नहीं करता, जितनी पीडा उसे दुष्टजनोंके मर्मान्तक एवं कठोर वाग्बाण पहुँचाते हैं॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.23.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 855) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/23/3/