श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

द्विज उवाच

नायं जनो मे सुखदुःखहेतु-

र्न देवताऽऽत्मा ग्रहकर्मकालाः।

मनः परं कारणमामनन्ति

संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत्॥ ४३

nāyaṃ jano me sukhaduḥkhahetu-

rna devatā''tmā grahakarmakālāḥ|

manaḥ paraṃ kāraṇamāmananti

saṃsāracakraṃ parivartayed yat|| 43

अर्थ

ब्राह्मण कहता—मेरे सुख अथवा दुःखका कारण न ये मनुष्य हैं, न देवता हैं, न आत्मा है और न ग्रह, कर्म एवं काल आदि ही हैं। श्रुतियाँ और महात्माजन मनको ही इसका परम कारण बताते हैं और मन ही इस सारे संसार-चक्रको चला रहा है॥ ४३॥

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