॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.23.53
आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः
किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः।
न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात्
क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखम्॥ ५३
ātmā yadi syāt sukhaduḥkhahetuḥ
kimanyatastatra nijasvabhāvaḥ|
na hyātmano'nyad yadi tanmṛṣā syāt
krudhyeta kasmānna sukhaṃ na duḥkham|| 53
अर्थ
यदि ऐसा मानें कि आत्मा ही सुख-दुःखका कारण है तो वह तो अपना आप ही है, कोई दूसरा नहीं; क्योंकि आत्मासे भिन्न कुछ और है ही नहीं। यदि दूसरा कुछ प्रतीत होता है तो वह मिथ्या है। इसलिये न सुख है, न दुःख; फिर क्रोध कैसा? क्रोधका निमित्त ही क्या?॥ ५३॥